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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
ते वध्यमानाः समरे पाञ्चालाः सृञ्जय़ैः सह |  १५   क
तृणप्रस्पन्दनाच्चापि सूतपुत्रं स्म मेनिरे ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति