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आदि पर्व
अध्याय २१८
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनो वेगवद्भिर्ज्वलिताग्रैरजिह्मगैः |  ४८   क
वाणैर्विध्वंसय़ामास गिरेः शृङ्गं सहस्रधा ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति