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द्रोण पर्व
अध्याय १६०
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सञ्जय़ उवाच
को हि गाण्डीवधन्वानं ज्वलन्तमिव तेजसा |  २४   क
अक्षय़ं क्षपय़ेत्कश्चित्क्षत्रिय़ः क्षत्रिय़र्षभम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति