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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
अपि स्वं समरे योधं धावमानं विचेतसः |  १६   क
कर्णमेवाभ्यमन्यन्त ततो भीता द्रवन्ति ते ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति