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वन पर्व
अध्याय १२०
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वासुदेव उवाच
उभौ हि युद्धेऽप्रतिमौ पृथिव्यां; वृकोदरश्चैव धनञ्जय़श्च |  २४   क
कस्मान्न कृत्स्नां पृथिवीं प्रशासे; न्माद्रीसुताभ्यां च पुरस्कृतोऽय़म् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति