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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
अवेक्षमाणास्तेऽन्योन्यं सुसंमूढा विचेतसः |  १८   क
नाशक्नुवन्नवस्थातुं काल्यमाना महात्मना ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति