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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा स्वसैन्यं प्रेक्ष्य विद्रुतम् |  २०   क
अपय़ाने मतिं कृत्वा फल्गुनं वाक्यमव्रवीत् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति