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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
कर्णसाय़कनुन्नानां क्रोशतामेष निस्वनः |  २२   क
अनिशं श्रूय़ते पार्थ त्वद्वन्धूनामनाथवत् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति