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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
यथा विसृजतश्चास्य सन्दधानस्य चाशुगान् |  २३   क
पश्यामि जय़विक्रान्तं क्षपय़िष्यति नो ध्रुवम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति