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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
यदत्रानन्तरं कार्यं प्राप्तकालं प्रपश्यसि |  २४   क
कर्णस्य वधसंय़ुक्तं तत्कुरुष्व धनञ्जय़ ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति