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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
पश्यामि च तथा कर्णं विचरन्तमभीतवत् |  २८   क
द्रवमाणान्रथोदारान्किरन्तं विशिखैः शितैः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति