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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं शरैः सङ्ख्ये सञ्छाद्य सुमहारथौ |  ३   क
पुनः पूर्णाय़तोत्सृष्टैर्विव्यधाते परस्परम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति