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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
स भवानत्र यात्वाशु यत्र कर्णो महारथः |  ३०   क
अहमेनं वधिष्यामि मां वैष मधुसूदन ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति