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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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वासुदेव उवाच
नैतस्यान्योऽस्ति समरे प्रत्युद्याता धनञ्जय़ |  ३२   क
ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र राक्षसाद्वा घटोत्कचात् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति