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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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वासुदेव उवाच
दीप्यमाना महोल्केव तिष्ठत्यस्य हि वासवी |  ३४   क
त्वदर्थं हि महावाहो रौद्ररूपं विभर्ति च ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति