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विराट पर्व
अध्याय ६२
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अर्जुन उवाच
स्वस्ति व्रजत भद्रं वो न भेतव्यं कथञ्चन |  ५   क
नाहमार्ताञ्जिघांसामि भृशमाश्वासय़ामि वः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति