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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
कवची स शरी खड्गी सधन्वा च विशां पते |  ३८   क
अभिवाद्य ततः कृष्णं पाण्डवं च धनञ्जय़म् |  ३८   ख
अव्रवीत्तं तदा हृष्टस्त्वय़मस्म्यनुशाधि माम् ||  ३८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति