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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
ततः पाञ्चालमुख्यस्य धृष्टद्युम्नस्य संय़ुगे |  ४   क
सारथिं चतुरश्चाश्वान्कर्णो विव्याध साय़कैः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति