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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
निशीथे सूतपुत्रेण शरवर्षेण पीडिताः |  ४५   क
एते द्रवन्ति पाञ्चालाः सिंहस्येव भय़ान्मृगाः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति