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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
कार्मुकप्रवरं चास्य प्रचिच्छेद शितैः शरैः |  ५   क
सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातय़त् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति