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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
केशवस्य वचः श्रुत्वा वीभत्सुरपि राक्षसम् |  ५३   क
अभ्यभाषत कौरव्य घटोत्कचमरिन्दमम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति