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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
स भवान्यातु कर्णेन द्वैरथं युध्यतां निशि |  ५५   क
सात्यकिः पृष्ठगोपस्ते भविष्यति महारथः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति