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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
पुनश्चेदीदृशं वाक्यं मद्रराज वदिष्यसि |  १०३   क
शिरस्ते पातय़िष्यामि गदय़ा वज्रकल्पय़ा ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति