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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रं श्येनस्य चरतो यथैवामिषगृद्धिनः |  १४१   क
तद्वदासीदभीसारो द्रोणं प्रार्थय़तो रणे ||  १४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति