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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
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जम्वुक उवाच
यदि गृध्रस्य वाक्यानि तीव्राणि रभसानि च |  १०१   क
गृह्णीत मोहितात्मानः सुतो वो न भविष्यति ||  १०१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति