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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
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भीष्म उवाच
शोकदैन्यसमाविष्टा रुदन्तस्तस्थिरे तदा |  १०५   क
स्वकार्यकुशलाभ्यां ते सम्भ्राम्यन्ते ह नैपुणात् ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति