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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
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भीष्म उवाच
कर्मान्तविहिते लोके चास्तं गच्छति भास्करे |  ११   क
गम्यतां स्वमधिष्ठानं सुतस्नेहं विसृज्य वै ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति