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शान्ति पर्व
अध्याय १८२
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भृगुरु उवाच
यस्य सर्वे समारम्भा निराशीर्वन्धनास्त्विह |  ११   क
त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च वुद्धिमान् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति