शान्ति पर्व  अध्याय १४९

गृध्र उवाच

अहो धिक्सुनृशंसेन जम्वुकेनाल्पमेधसा |  २८   क
क्षुद्रेणोक्ता हीनसत्त्वा मानुषाः किं निवर्तथ ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति