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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
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गृध्र उवाच
तपः कुरुत वै तीव्रं मुच्यध्वं येन किल्विषात् |  ३०   क
तपसा लभ्यते सर्वं विलापः किं करिष्यति ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति