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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
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जम्वुक उवाच
अद्य शोकं विजानामि मानुषाणां महीतले |  ४५   क
स्नेहं हि करुणं दृष्ट्वा ममाप्यश्रूण्यथागमन् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति