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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
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गृध्र उवाच
अद्य वर्षसहस्रं मे साग्रं जातस्य मानुषाः |  ५०   क
न च पश्यामि जीवन्तं मृतं स्त्रीपुंनपुंसकम् ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति