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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
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गृध्र उवाच
अनिष्टानां सहस्राणि तथेष्टानां शतानि च |  ५४   क
उत्सृज्येह प्रय़ाता वै वान्धवा भृशदुःखिताः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति