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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
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गृध्र उवाच
न चक्षुर्भ्यां न कर्णाभ्यां संशृणोति समीक्षते |  ५७   क
तस्मादेनं समुत्सृज्य स्वगृहान्गच्छताशु वै ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति