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वन पर्व
अध्याय १२१
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वैशम्पाय़न उवाच
स पय़ोष्ण्यां नरश्रेष्ठः स्नात्वा वै भ्रातृभिः सह |  १५   क
वैडूर्यपर्वतं चैव नर्मदां च महानदीम् |  १५   ख
समाजगाम तेजस्वी भ्रातृभिः सहितोऽनघः ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति