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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
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गृध्र उवाच
अश्रुपातपरिक्लिन्नः पाणिस्पर्शनपीडितः |  ६६   क
धर्मराजप्रय़ोगाच्च दीर्घां निद्रां प्रवेशितः ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति