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शल्य पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
अद्यास्य शतधा देहं भिनद्मि गदय़ानय़ा |  १९   क
नाय़ं प्रवेष्टा नगरं पुनर्वारणसाह्वय़म् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति