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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
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जम्वुक उवाच
दारुणो मर्त्यलोकोऽय़ं सर्वप्राणिविनाशनः |  ८०   क
इष्टवन्धुविय़ोगश्च तथैवाल्पं च जीवितम् ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति