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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
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जम्वुक उवाच
न मे मानुषलोकोऽय़ं मुहूर्तमपि रोचते |  ८२   क
अहो धिग्गृध्रवाक्येन संनिवर्तथ मानुषाः ||  ८२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति