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द्रोण पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
नील किं वहुभिर्दग्धैस्तव योधैः शरार्चिषा |  २१   क
मय़ैकेन हि युध्यस्व क्रुद्धः प्रहर चाशुगैः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति