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द्रोण पर्व
अध्याय १४०
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सञ्जय़ उवाच
नरास्तु वहवस्तत्र समाजग्मुः परस्परम् |  २२   क
गदाभिर्मुसलैश्चैव नानाशस्त्रैश्च सङ्घशः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति