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वन पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा तु तस्मिन्निहते रावणे लोककण्टके |  १९   क
कीर्तिर्नश्येद्राघवस्य तत एतदुपेक्षितम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति