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वन पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
तद्गच्छ विपुलप्रज्ञ भ्रातुः प्रिय़हिते रतः |  २१   क
अरिष्टं क्षेममध्वानं वाय़ुना परिरक्षितः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति