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वन पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मो यत्र धर्माख्यो धर्मश्चाधर्मसञ्ज्ञितः |  २७   क
विज्ञातव्यो विभागेन यत्र मुह्यन्त्यवुद्धय़ः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति