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शल्य पर्व
अध्याय ५०
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जनमेजय़ उवाच
कथं द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां तपोधनः |  ४   क
वेदानध्यापय़ामास पुरा सारस्वतो मुनिः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति