वन पर्व  अध्याय १४९

वैशम्पाय़न उवाच

क्षत्रधर्मोऽत्र कौन्तेय़ तव धर्माभिरक्षणम् |  ३७   क
स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व विनीतो निय़तेन्द्रिय़ः ||  ३७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति