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वन पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
तद्रूपं कदलीषण्डं छादय़न्नमितद्युतिः |  ४   क
गिरेश्चोच्छ्रय़मागम्य तस्थौ तत्र स वानरः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति