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वन पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रं याति तथा स्वर्गं भुवि निग्रहपालनैः |  ५२   क
सम्यक्प्रणीय़ दण्डं हि कामद्वेषविवर्जिताः |  ५२   ख
अलुव्धा विगतक्रोधाः सतां यान्ति सलोकताम् ||  ५२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति