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द्रोण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
ततः कृष्णः स्मितं कृत्वा परिणन्द्य शिवेन तम् |  ४   क
प्रावेशय़त दुर्धर्षो यत्र यत्रैच्छदर्जुनः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति