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उद्योग पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः |  ३८   क
अव्रवीत्पुण्डरीकाक्षो धनञ्जय़मवेक्ष्य ह ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति