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वन पर्व
अध्याय १८८
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वैशम्पाय़न उवाच
आश्चर्यभूतं भवतः श्रुतं नो वदतां वर |  ४   क
मुने भार्गव यद्वृत्तं युगादौ प्रभवाप्ययौ ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति