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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
रक्तोक्षितैश्छिन्नभुजैरपकृष्टशिरोरुहैः |  ५२   क
व्यदृश्यत मही कीर्णा शतशोऽथ सहस्रशः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति