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उद्योग पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
युज्यतां वाहिनी साधु वधसाध्या हि ते मताः |  ४३   क
न धार्तराष्ट्राः शक्ष्यन्ति स्थातुं दृष्ट्वा धनञ्जय़म् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति